तीज-त्योहार:संतान सुख पाने और दुश्मनों पर जीत के लिए किया जाता है स्कंद षष्ठी का व्रत, शक्ति के अधिदेव हैं भगवान स्कंद देव

हर महीने आने वाली शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाता है। षष्ठी तिथि की शुरुआत 4 जुलाई, सोमवार को शाम 6.32 से होगी और ये तिथि 5 जुलाई को शाम 7.28 तक रहेगी। इसलिए सूर्योदय काल में षष्ठी तिथि मंगलवार को होने से इस बार ये व्रत 5 जुलाई को रखा जाएगा। यह व्रत संतान की उन्नति और उनके सुखी जीवन के लिए रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय की पूजा की जाती है और महिलाओं द्वारा व्रत रखा जाता है। शिव जी के तेज से उत्पन्न बालक कार्तिकेय का एक नाम स्कंद कुमार भी है और बालक के 6 मुख थे।

स्कंद कुमार: शक्ति के अधिदेव और देवताओं के सेनापति
भगवान स्कंद शक्ति के अधिदेव हैं। ये देवताओं के सेनापति भी कहे जाते हैं। इनकी पूजा दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती है। यहाँ पर ये मुरुगन नाम से भी प्रसिद्ध है। भगवान स्कंद हिंदू धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं। इन्हें कार्तिकेय और मुरुगन भी कहते हैं। दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव पार्वती के पुत्र हैं। कार्तिकेय भगवान के ज्यादातर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा खासतौर से तमिलनाडु और भारत के दक्षिणी राज्यों में होती है। भगवान स्कंद का सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडु में ही है।

स्कंद षष्ठी व्रत का महत्व
स्कंद पुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं को दूर करने वाले इस व्रत का विधान बताया है। एक दिन पहले से उपवास करके षष्ठी को कुमार यानी कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। भगवान कार्तिकेय का ये व्रत करने से दुश्मनों पर जीत मिलती है। वहीं हर तरह की परेशानियां भी दूर हो जाती हैं। पुराणों के अनुसार स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई। ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि स्कंद षष्ठी की कृपा से ही प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता है।

स्कंद षष्ठी व्रत पूजा
इस दिन प्रात: स्नानादि करके भगवान सूर्य को जल अर्पित कर भगवान कार्तिकेय को फूल, फल, चावल, धूप, दीपक, गंध, लाल चंदन, मोर का पंख आदि अर्पित करें। इस दिन मंदिर में जाकर भगवान शिव और उनके पूरे परिवार की पूजा करें और मिष्ठान का भोग लगाएं। यथासंभव दान का महत्व भी है।


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